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मानव अथवा शासन-प्रशासन की ग़लती अथवा ग़लत नीतिजनित दुश्वारियां क्यों झेलें हम?
-देवीसिंह राठौड़, तिलोड़ा
जालोर ।
पश्चिमी राजस्थान में यूं तो कभी अनावृष्टि का क़हर बरपता है और कभी अतिवृष्टि का । यह प्रकृतिजन्य प्रतिकूल परिस्थिति । किसी का बस भी नहीं चलता । क़ुदरत के आगे बेबस । लेकिन, मानव अथवा शासन-प्रशासन की ग़लती अथवा ग़लत नीतिजनित दुश्वारियां क्यों झेलें हम?
जालोर जिले के लिए जवाई बांध जनित दुश्वारियां प्राकृतिक नहीं, सरकारजन्य ही कही जाएंगी । ईस्वी सन् 1983 (विक्रम संवत् 2040) के पावसकाल में वर्षों बाद पश्चिमी राजस्थान में अतिवृष्टि हुई थी ।
जालोर जिले में जवाई (सुकड़ी) नदी में उस साल जल प्रवाह हुआ था । वो बहाव सिरोही जिले के झोरा-मगरा क्षेत्र एवं माउंट आबू के उत्तरी पठार में हुई व्यापक बारिश का पानी था न कि जवाई बांध से छोड़े गए पानी के कारण । इसके फलस्वरूप जिले के कृषि कुओं का भू-जल स्थिर हो गया था । इसके बाद लगातार अनावृष्टि का दंश । भूमिगत जलस्तर ने रसातल की राह पकड़ ली । अलबत्ता, सन् 1986 (विक्रम संवत् 2043) के वर्षाकाल में बादल बरसे अवश्य, लेकिन अन्न उपजने योग्य बरसात ही हो पाई ।
भूमिगत जलस्तर का रसातल की ओर कूच करना जारी रहा । जिले के किसानों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट मुंह बाएं खड़ा हो गया । पशुधन बचाना टेढ़ी खीर । इसके बाद आया सन् 1987 (विक्रम संवत् 2044) का ऐतिहासिक दुर्भिक्ष। अब तक किसान अपना तथा अपने परिवार का पेट पालने एवं पशुधन को बचाए रखने के लिए अपनी जमा पूंजी, बैंकों, सेठ-साहूकारों से ऋण लेकर पानी की ख़ातिर पैसे कृषि कुओं में फूंक चुके थे । चहुंओर हाहाकार मच गया था । धूल-कंकर मिली गेहूं की भूसी भी मुंह मांगे दामों में नहीं मिल पा रही थी ।
तत्कालीन क्षेत्रीय सांसद स्वर्गीय सरदार बूटासिंह ने भारवाहक रेलों के ज़रिए उनके पैतृक राज्य पंजाब से हरे चारे के लिए गन्ना डलवाकर पशुधन बचाने का प्रयास किया भी था। क्षेत्रीय लोगों (ग्रामीण क्षेत्रों के) ने पहली मर्तबा गन्ने के रस का स्वाद चखा था । लेकिन, पशुबहुलता के मद्देनजऱ उनका यह सराहनीय प्रयास भी ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हुआ । गन्ना गायों की बजाए मनुष्यों एवं भैंसों के पेट में जाने लगा।गायों को बेसहारा छोड़ दिया गया सिंदूर का तिलक लगाकर। क्षेत्र में सनातन धर्म के गौरव गौवंश को पहली मर्तबा बेसहारा छोड़ा गया था । उस वर्ष प्रतिकूल परिस्थिति और उसके बाद परिपाटी बन गई ।
ईस्वी सन् 1990 (विक्रम संवत् 2047) । अद्वितीय अतिवृष्टि। पश्चिमी राजस्थान ही नहीं, अपितु राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से दक्षिण भारत के द्वारिका तक तीन दिन और तीन रात लगातार इकसार बारिश । मानो बड़े क्षेत्रफल में बादल फट गए हों । उस वर्ष एक ही वर्षाकाल में, महज़ एक माह के अंतराल में जालोर जिले में दो बार बाढ़ विभीषिका का दंश । जुलाई और अगस्त माह में ।
जवाई नदी अपने पूरे जलाल-जमाल के साथ, पूरे वेग के साथ प्रवाहित और जवाई बांध के फ़ाटक खोल दिए जाते हैं । विनाशलीला का तांडव अवर्णनीय । बागोड़ा तहसील के चैनपुरा गांव के 34 लोग बाढ़ के बहते पानी में अपनी जान से हाथ धो बैठे । यह बड़ा आंकड़ा होने से उल्लेखनीय, जबकि छिटपुट मौतों के आंकड़े इससे भी कई गुना अधिक । अनगिनत मवेशी पानी के तेज़ बहाव में बह गए । कगार ढह गए । बेशक़ीमती कृषि भूमि का कटाव हो गया ।
तत्कालीन क्षेत्रीय सांसद स्वर्गीय सरदार बूटासिंह ने चैनपुरा गांव में बाढ़ से मरने वाले 34 लोगों के परिजनों को 10-10 हज़ार रुपए की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की थी, जो केवल और केवल घोषणा बनकर ही रह गई । सरदार बूटासिंह अपने भारी भरकम लश्कऱ-लवाज़मे के साथ चैनपुरा आए थे । घोषणा करने के बाद अपने क़ाफि़ले के वाहनों से धूल के गुबार उड़ाते हुए लोगों की आंखों में धूल झोंककर चलते बने । कभी जल बिना मरें तो कभी जल से। जालोर जिले के बाशिंदों की यही नियति बन गई है ।




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