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‘मलाई’ के फेर में अफसरों की अनदेखी, जिले में पनपने लगी अवैध कॉलोनियां

-आहोर व सायला बने अवैध कॉलोनियों के गढ़

अल्लाहबक्श खान जालोर
जिले में राजस्व नियमों को ताक पर रखकर भूमाफिया चांदी काट रहे हैं, तो दूसरी तरफ भूमाफिया से मिलने वाली मलाई ने राजस्व अधिकारियों के मुंह बंद कर रखे है। यही वजह है कि नगर निकायों को छोड़कर जिलेभर में अवैध आवासीय कॉलोनियों की बाढ़ आ रही हैं। ऐसा नहीं है कि राजस्व विभाग के अधिकारियों को इसकी भनक नहीं है, बल्कि सब कुछ जानते हुए भी उन्होंने मौन साध रखा है। यही अनदेखी राजस्व को बड़ी क्षति पहुंचाने के साथ ही अनियोजित कॉलोनियों की वजह बनती जा रही है। हालांकि जिला प्रशासन की ओर से पूर्व में कई बार जिले के सभी उपखंड अधिकारियों व तहसीलदारों को लिखित आदेश जारी कर आवासीय यूनिट संपरिवर्तन की जानकारी उपलब्ध कराने एवं अवैध रूप से बस रही आवासीय कॉलोनियों पर अंकुश लगाने की हिदायत दी थी, लेकिन अब तक इस मामले में ढाक के तीन पांत वाली स्थिति बनी हुई है।
ऐसे देते हैं खेल को अंजाम
दरअसल, ग्राम पंचायत क्षेत्रों में निजी कॉलोनी डवलपर्स औने-पौने दाम में कृषि भूमि की खरीद करते हैं। इसके बाद इसे २५०० वर्ग मीटर (करीब डेढ़ बीघा) के टुकड़े करवाकर व्यक्तिगत आवासीय उपयोग के लिए कृषि भूमि से आबादी में संपरिवर्तन करवाते हैं। इसके लिए संबंधित तहसीलदार को फाइल पेश की जाती है। तत्पश्चात भू अभिलेख निरीक्षक की ओर से मौका रिपोर्ट बनाई जाती है। जिसमें भूमि के विवाद संबंधित जानकारी देकर अनापत्ति जारी की जाती है। इसके बाद संबंधित व्यक्ति इस भूमि के व्यक्तिगत तौर पर आवासीय प्रयोजनार्थ संपरिवर्तन करवाने एवं इसे आगे बेचान नहीं करने का शपथ पत्र पेश करता है। जिसमें शर्तों के उल्लंघन पर स्वयं के जिम्मेदार होने का हवाला भी होता है। इसके लिए चालान के जरिऐ संपरिवर्तन शुल्क जमा कराया जाता है। जिस पर तहसीलदार की ओर से आबादी संपरिवर्तन किया जाता है। इसके बाद निजी डवलपर्स की ओर से इसमें भूखंड एवं मकान बनाकर अनधिकृत तौर पर बेचान करने के साथ ही रजिस्ट्री करवाई जा रही है।
इधर राजस्व हानि, उधर सुविधाओं से महरूम
इस पूरे खेल में सरकार को जमकर राजस्व हानि होती है। दरअसल, तहसीलदार को आवासीय यूनिट के लिए कृषि भूमि से आबादी संपरिवर्तन के लिए २५०० वर्ग मीटर (करीब डेढ़ बीघा) तक अधिकार है। इसके लिए संपरिवर्तन शुल्क भी प्रति वर्ग मीटर महज ५ रुपये है। जबकि कॉलोनी या प्रोजेक्ट के लिए यह शुल्क साढ़े सात रुपये प्रति वर्ग मीटर या डीएलसी दर का पांच प्रतिशत जो भी अधिक हो वह दिया जाना निर्धारित है। इससे बचने के लिए ही निजी डवलपर्स की ओर से सैकड़ों बीघा भूमि को भी डेढ़-डेढ़ बीघा में टुकड़े करके आबादी संपरिवर्तन करके बेचान किया जा रहा है। इतना ही नहीं इससे भी बड़ा खेल आवासीय कॉलोनी की भूमि के उपयोग को लेकर होता है। कायदों के मुताबिक आवासीय कॉलोनी में ५५ फीसदी भूमि पर आवास एवं ५ फीसदी भूमि पर कॉर्मशियल शॉप बनाना जरूरी है, जबकि ४० फीसदी भूमि सरकार को सुपुर्द करनी होती है, जिसमें सुविधाएं (रोड, अस्पताल, बाग, स्कूल, मंदिर) विकसित करनी होती है। लेकिन हकीकत इसके उलट है। निजी आवासीय उपयोग के लिए संपरिवर्तन कराने के बाद इसके अवैध बेचान के साथ ही इन कॉलोनियों में सुविधाएं भी विकसित नहीं की जाती हैं। कॉलोनी में चालीस फीट का रास्ता होना जरूरी है, जबकि इन कॉलोनियों में कई जगह तो महज पंद्रह से बीस फीट के मु य रास्ते ही बनाए जाते हैं। जो भविष्य में सिकुड़कर नाममात्र के रह जाते हैं। सुविधाएं विकसित करने के बजाय निजी डवलपर्स की ओर से इस भूमि में भी भूखंड काटकर बेचान कर दिए जाते हैं। इसके अलावा कॉलोनी डवलपर्स की ओर से ग्राम पंचायत में विकास शुल्क भी जमा नहीं कराया जाता है। जिससे भूखंड खरीदने वाले को बिजली, पानी व रोड की सुविधाएं समय रहते मुहैया नहीं हो पाती।
यह है कॉलोनी के लिए कायदा
राजस्थान भूमि राजस्व (ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि भूमि का अकृषि प्रयोजनार्थ संपरिवर्तन) नियम २००७ के नियम २ के तहत आवासीय कॉलोनी या प्रोजेक्ट की परिभाषा दे रखी है। जिसके अनुसार आवासीय भूखंड, लैट, गृह को डवलपर्स की ओर से डपलप करके ही बेचा जा सकता है। कायदों के मुताबिक कॉलोनी या प्रोजेक्ट के लिए उपखंड अधिकारी को तीन बीघा भूमि को संपरिवर्तन करने का अधिकार है, जबकि इससे ज्यादा व ३२ बीघा भूमि तक संपरिवर्तन का अधिकार जिला कलेक्टर को है। इससे ज्यादा की भूमि के लिए राज्य सरकार को फाइल पेश करनी होती है। लेकिन निजी कॉलोनी डवलपर्स की ओर से नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
अवैध कॉलोनियों के गढ़ बने आहोर व सायला
नगर निकाय क्षेत्रों को छोड़ दे तो जिले के तकरीबन सभी बड़े कस्बों में अवेध कॉलोनियां धड़ल्ले से बस रही हैं, लेकिन आहोर व सायला उपखंड मुख्यालय व इसके आसपास का क्षेत्र अवैध कॉलोनियों का गढ़ बनता जा रहा है। आहोर में तो हाल यह है कि एक-दो कॉलोनियों को छोड़ दे तो अधिकांश कॉलोनियां अनधिकृत तौर पर बसाई गई है। जिसमें नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गई हैं। वर्तमान में आहोर और सायला उपखंड क्षेत्र के सभी बड़े कस्बों में इस तरह की अवैध कॉलोनियां हैं, जहां आवासीय कॉलोनी या प्रोजेक्ट के लिए संपरिवर्तन ही नहीं कराया गया।
डॉ. जितेंद्र सोनी ने लगाई थी रोक
जालोर के पूर्व जिला कलेक्टर डॉ. जितेंद्र सोनी ने अपने कार्यकाल के दौरान जिले के सभी उपखंड अधिकारियों व तहसीलदारों को आदेश जारी कर अवैध कॉलोनियों के विरुद्ध कार्रवाई करने एवं कॉलोनी बनाने की आड़ में डेढ़ बीघा जमीन के संपरिवर्तन नहीं करने के आदेश दिए थे। साथ ही चितलवाना तहसीलदार को उल्लंघन करने पर नोटिस भी जारी किया गया था।
संदेह के दायरे में तहसीलदारों की चुप्पी
आवासीय प्रयोजनार्थ संपरिवर्तन करवाने एवं इसे आगे बेचान नहीं करने का शपथ पत्र भी पेश किया जाता है। जिसमें शर्तों के उल्लंघन पर स्वयं के जिम्मेदार होने का हवाला भी होता है। लेकिन ताज्जुब की बात तो यह है कि आज तक तहसीलदारों की ओर से इन शर्तों का उल्लंघन करने पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। आम तौर पर दस्तावेज पंजीयन के समय लोगों को टाइटल का हवाला देकर कई तरह की औपचारिकताएं पूर्ण करवाई जाती है, लेकिन अवैध कॉलोनियों के भूखंडों के बेचान के समय ना तो दस्तोवेजों की जांच की जाती है और ना ही कोई कार्रवाई। खात बात तो यह है कि इस खेल में पंजीयन कार्य से जुड़े कर्मचारियों की भी सक्रिय भूमिका रहती है।

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