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कब मरें मां-बाप… ?

देवीसिंह राठौड़ा तिलोड़ा

उस रात तीन बजे का समय था । मैं भरी नींद में था । अचानक मेरी अद्र्धांगिनी ने झिंझोड़ कर मुझे जगा दिया । मैं अतिक्रमित सरकारी भूमि पर यकायक खड़ी हुई गगनचुम्बी अट्टालिकाओं की मानिन्द हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ । आम भारतीय पतियों की तरह मिमियाते हुए पूछा? क्या हुआ? कोई डरावना सपना देखा क्या? डर गईं क्या ? डरूं और मैं दशकों से आपके साथ रह रही हूं आपके डरावने चेहरे से डर नहीं लगता फिर डरावने सपने की बिसात ही क्या वे तुनक कर बोलीं । तो क्या हुआ भाग्यवान तबीयत तो ठीक है मैंने कसाई के हाथों ज़िबह होते बकरे की भांति दारुण स्वर में पूछा ।

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भाग्यवान मत कहिए मुझे… मेरे भाग्य तो उसी दिन फूट गए थे जिस दिन मेरे बाप ने मुझे आप जैसे नि_ल्ले के पल्ले बांधा था। काम के न काज के दुश्मन अनाज के । मेरी सहेली शीला के पति को ही देखिए… वे बरस पड़ीं । क्या देखूं आपकी सहेली शीला के पति को मैंने तैश में आकर कहा । कितना कमाता है वो उसके बंगले के क्या ठाठ हैं… शीला हमेशा नख से शिख तक ज़ेवरों से लदी फदी रहती है और एक मैं हूं कि… उन्होंने जानबूझकर अपनी बात अधूरी छोड़ दी ।

शीला का पति शीला का पति… हमेशा एक ही रट लगाए रहती हैं… जानती भी हैं शीला का पति भू-माफियां तस्कर है । उसके चकले मटके चलते हैं… दुनियाभर के अनैतिक काम करता है वो… मैंने वितृष्णा के साथ कहा । उससे क्या फर्क पड़ता है जिले के आला प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस के उच्चाधिकारियों के अलावा सांसद, विधायक, मंत्री आए दिन उसके घर दावत उड़ाते रहते हैं… क़ानून के रखवालों के लिए उसके क्रियाकलाप ग़लत नहीं और आप अपनी ही राग अलापे जा रहे हैं ।

उन्होंने मुंह बिचूरकर कहा । रात के तीन बजे आपने मुझे शीला के पति का गुणगान करने के लिए ही जगाया था क्या मैंने कुढ़ते हुए कहा। नहीं, मैंने आपको यह कहने के लिए जगाया था कि आप मरिएगा मत । उनके मुंह से यह अप्रत्याशित वाक्य सुनते ही मैं फूल कर कुप्पा हो गया। अपनी पतलून में नहीं समाया। अरे साहब, बर्बादी, क्षमा कीजिएगा, शादी के दशकों बाद पहली मर्तबा मालूम हुआ कि पत्नी के लिए अपनी भी कोई अहमियत है… भ्रम मिटाने के लिए डरते, कांपते, लरज़ती आवाज़ में पूछ ही लिया आपके लिए मैं इतना महत्वपूर्ण हूं। महत्वपूर्ण हैं या नहीं फिज़ूल की बातें छोडिए मरिएगा मत बस! उन्होंने ल_ मार अंदाज़ में कहा।

याद कीजिए वो दिन मेरे मित्र मुझसे मिलने आए थे और मैं पलंग के नीचे दुबका हुआ था…मेरे मित्र ने जब अचरज से पूछा कि यहां क्या कर रहे हैं, तब अपनी इज़्ज़त बचाते हुए कहा था कि मेरा घर है जहां चाहूं वहां लेट सकता हूं । उन्हें कैसे बताता कि आपके हाथों में थमे झाड़ू के प्रहारों से बचने के लिए छिपा हुआ हूं ।

भूल गईं क्या, उस रोज़ किसी बात को लेकर हम पति पत्नी के बीच तनाज़ा हुआ था और आपने बेलन, बेलन सिर्फ़ रोटियां बेलने का साधन ही नहीं भारतीय पत्नियों का एक हथियार भी है, जिसे वे अपने पतियों पर ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयुक्त करती हैं, दनदना दिया था । मैं आत्मरक्षार्थ अपने स्थान से हट गया था और तिजोरी का कांच टूट गया था । उस दिन थक कर चूर होने तक आपने मेरी धुनाई की थी… इस तर्क के साथ कि तिजोरी का कांच मेरी वजह से टूटा था । मुझे अपने स्थान पर ही खड़ा रहना चाहिए था…, आप सोच रहे होंगे कि मैं चुटकुलों पर उतर आया हूं… यह चुटकुले नहीं मोहतरम, ठोस वास्तविकता है, भारतीय पतियों की नियति है । यूं भी काव्य पाठ, शायरी के नाम पर चुटकुले सुनाकर भाई लोग कवि सम्मेलनों में छा जाते हैं, मुशायरे लूट लेते हैं, ख़ाक़सार तो आम भारतीय पतियों की आपबीती ही बता रहा है।

आज यकायक मेरी इतनी कद्र मैं मरूं नहीं, यह चिंता, इतनी रात गए जगा दिया, मैंने असमंजस से पूछा । आप मरें या जीवित रहें इस फालतू के पचड़े में नहीं पडऩा चाहती…अलबत्ता आपके जिंदा रहने से मेरा बहुत बड़ा स्वार्थ जुड़ा हुआ है । आपके जिंदा रहने से मैं बनसंवर सकती हूं । नित नए वस्त्राभूषण पहन सकती हूं । शादी-विवाह जैसे शुभ समारोहों में शामिल हो सकती हूं और आपको पीट भी सकती हूं । उन्होंने सपाट लहज़े में कहा । अपने इस स्वार्थ की ख़ातिर आप मुझे जिंदा देखना चाहती हैं। वाह! त्रिया चरित्र जाने न कोय, पति मार फिर सती होय… मैं जीना नहीं चाहता, बोलिए, कब मरूं मैंने किलसकर कहा । कब मरूं उह… पूछ लीजिए अपने मां-बाप से । उन्होंने मुंह बनाकर कहा ।

मैं खिन्न होकर अपने मां-बाप के पास गया और बंदूक़ की गोली की भांति अपना सवाल दनदनाया, मैं कब मरूं माता-पिता तपाक से बोल उठे, नहीं बेटे, तू नहीं मरेगा । तू बग़ैर चारे का बैल है । हल से कोल्हू में और कोल्हू से हल में जुता जाने वाला… तू बिना पारिश्रमिक का श्रमिक है… हमारा नामलेवा हमारी मृत्यु के बाद कपाल क्रियाए पिंडदान कौन करेगा। हमें मोक्ष कैसे मिलेगा श्राद्धकर्म कौन करेगा दुनिया दिखाने वाले भी स्वार्थ की दलदल में आकंठ डूबे हुए… हृदय विदीर्ण… न चाहते हुए भी मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया। आप लोग कब मरेंगे आखिर आपको मरना तो है ही । अब मरें या तब… महंगाई देश में बढ़ रही गऱीबी के अनुपात में बढ़ रही है ।

अगले साल मरे तो ख़र्च डेढ़ गुना बढ़ जाएगा । तू कहे तो बेटा आज ही मर जाएं… माता-पिता ने कातर स्वर में कहा । नहीं आप लोग शीतकाल में मत मरिएगा, मातमपुर्सी के लिए आने वाले परिचितों, रिश्तेदारों के लिए भोजन, बिस्तर, रज़ाई और ठिठुरन से बचाव के लिए अलाव हेतु ईंधन अधिक चाहिए होगा । वर्षाकाल में अंधड़-बारिश से बचाने के लिए जगह की व्यवस्था व्ययसाध्य । ग्रीष्मकाल में तो भूलकर भी मत मरिएगा । शीतल जल से लेकर शीतल ठौर के लिए व्यय ही व्यय… कहते हुए बोझिल क़दमों से मैं अपने शयनकक्ष की ओर चल पड़ा । मेरे कानों में माता-पिता की फुसफुसाहट सुनाई पड़ रही थी, हे ईश्वर! तीसरी से चौथी ऋतु क्यों नहीं बनाई तुमने् कब मरें हम……..?

shrawan singh
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3 Replies to “कब मरें मां-बाप… ?

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