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जालोर जिले के लिए रिसता नासूर जवाई बांध

 करीब अड़तीस फ़ीट की गहराई में मिलने वाला भूजल लगभग छ: सौ फीट की गहराई तक पहुंचा

कुंभकर्णी नींद से जगें किसान संगठन और किसान

जालोर। यदि जवाई बांध को जालोर जिले के लिए रिसता नासूर कहां जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज से तीस-पैंतीस साल पहले जिले के गांवों में जहां भूजल करीब अड़तीस फीट की गहराई में मिल जाता था, वहां अब लगभग छ: सौ फीट की गहराई तक पहुंच गया है।करीब तीस-पैंतीस साल पूर्व जवाई नदी के किनारे आबाद गांवों के किसानों के लिए खेती-किसानी बेहद आसान हुआ करती थी।

खेत की जुताई और कुआं खुदाई का कार्य एक साथ शुरु करने पर खेत तैयार न होने पाए, तब तक कुएं में पानी तैयार। दस हजार रुपए का व्यय और साढ़े सैंतीस-अड़तीस फीट की गहराई तक खुदाई। मीठा एवं प्रचुर मात्रा में पानी उपलब्ध।पानी की गुणवत्ता ऐसी कि प्रत्येक सिंचाई के बाद फसलों की उन्नति ऐसा आभास कराती थी मानो पानी की जगह उर्वरक दे दिया गया हो। खेतों में सोना उगता और खलिहान हीरों की खान।

सन् नब्बे के जुलाई और अगस्त माह की बाढ़ विभीषिका ने क्षेत्रीय किसानों को निहाल कर दिया था। जिस जमीन में फसल बोई, उस जमीन की कीमत के समान उपज। उत्तम खेती की कहावत पूर्णत: सार्थक। रफ्ता-रफ्ता पानी रसातल की ओर कूच करने लग गया।पैदावार में भी गिरावट आने लगी। पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित होने लगी। आज स्थिति यह है कि क्षारत्व, लवणीय, फ्लोराइड युक्त पानी और करीब छ: सौ फीट की गहराई में।

चार-पांच लाख रुपए का व्यय और उपज के नाम पर लागत खर्च की भरपाई भी नहीं। वो भी जमाना था, जब तिलोड़ा, तीखी, केशवना, धानसा आदि गांवों में मिर्ची की भरपूर फसल हुआ करती थी। तिलोड़ा की मिर्ची की विशिष्ट पहचान थी।समीपवर्ती बाड़मेर जिले के लोगों की पहली पसंद तिलोड़ा की मिर्ची। मिर्ची की पकाई के दिनों (शीतकाल में) तिलोड़ा गांव में मेले-सा माहौल। तिलोड़ा गांव में बाड़मेर जिले से मिर्ची खरीदने आने वाले लोगों की रेलमपेल।

खेत खलिहान हो, चाहे गांव की गलियां, थली बोली और थली परिधान वाले लोगों, गोलबंद से सुसज्जित ऊंटों की चहल-पहल। आज तिलोड़ा गांव की मिर्ची तिलोड़ा गांव की आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाती, जबकि लागत कईं गुना। क्षेत्र में फल सब्जियां भी डीसा से आयातित।

एक दर्द यह भी
जवाई नदी में पानी का प्रवाह नहीं होने से किसानों के समक्ष एक विचित्र समस्या उत्पन्न हो गई है। जवाई (सुकड़ी) नदी के दक्षिणी तट पर स्थित गांवों के कृषि कुओं का जल पूर्णत: खारा हो गया है। फसल सिंचाई की बात तो छोडिए, मनुष्यों एवं मवेशियों के पीने लायक भी नहीं। बागोड़ा तहसील का दामण गांव इसकी जीती-जागती मिसाल है। जिस दामण गांव के हर खेत में पैदावार का अंबार लगा करता था, उसी दामण गांव के लोग पीने के पानी के लिए तिलोड़ा गांव से आपूर्ति किए जाने वाले पेयजल पर निर्भर। कमोबेश यही स्थिति सुकड़ी नदी के दक्षिणी तट पर स्थित प्रत्येक गांव की बन गई है।

कुंभकर्णी नींद से जगें किसान संगठन और किसान
जिले में सक्रिय भारतीय किसान संघ, भारतीय किसान यूनियन एवं अन्य किसानों से संबंधित तंज़ीमें और किसान आखिर कब तक कुंभकर्णी नींद की आगोश में रहेंगे? यदि यह कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिले का किसान आंदोलन और किसान नेतृत्व दिशाभ्रमित है।क्या बिजली संकट ही जिले के किसानों की एकमात्र समस्या है? जब सिंचाई के लिए पानी ही नहीं होगा, तो बिजली की भरपूर आपूर्ति भी किस काम की?

यदि जिले के किसान संगठन और किसान नेता समय रहते नहीं चेते, जवाई बांध से जालोर जिले के हिस्से का पानी प्राप्त करने के लिए आंदोलन की राह अख्तियार नहीं की, तो वो दिन दूर नही, जब जालोर जिला दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन सिटी बनकर रह जाएगा। केपटाउन सिटी अर्थात् शून्य भूजल। भूजल रहित क्षेत्र बनने देने में भलाई है अथवा अपने हक का पानी लेकर रहने में, जिससे जालोर जिले की धरा सदैव गुलजार रहे।

shrawan singh
Contact No: 9950980481

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