- नारी शक्ति वंदन का दम भरने वाली भाजपा के प्रशिक्षण शिविर से ‘आधी आबादी’ नदारद
- दावा 33% आरक्षण का, पर संगठन की पाठशाला में एक भी महिला नहीं; सायला मंडल की कार्यशाला ने खोली दावों की पोल
सायला।
केंद्र की भाजपा सरकार ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के जरिए राजनीति में महिलाओं को 33 प्रतिशत हिस्सेदारी देने का ढिंढोरा पीट रही है। चर्चा है कि 2029 से पहले ही परिसीमन और जनगणना के दांव-पेच सुलझाकर इसे लागू कर दिया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। भाजपा के संगठन स्तर पर ही महिलाओं की भागीदारी शून्य नजर आ रही है।
सायला मंडल के दो दिवसीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण कार्यशाला में इसकी बानगी देखने को मिली, जहाँ ‘शक्ति वंदन’ की बातें तो हुईं, लेकिन पांडाल में एक भी महिला पदाधिकारी नजर नहीं आई।
मुख्य सचेतक गिनाते रहे उपलब्धियां, सुनने वाली कोई ‘शक्ति’ नहीं
कार्यशाला के पहले सत्र में मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग और जिला संगठन प्रभारी महेंद्र मेघवाल ने केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं का जमकर बखान किया। उन्होंने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे गांव-गांव, ढाणी-ढाणी जाकर सरकारी योजनाओं का प्रचार करें।
विडंबना देखिए, वक्ता महिलाओं से जुड़ी उज्ज्वला और लखपति दीदी जैसी योजनाओं की सफलता गिना रहे थे, लेकिन वहां ऐसी एक भी महिला कार्यकर्ता मौजूद नहीं थी जो इन योजनाओं को वंचित महिलाओं तक पहुँचाने की कड़ी बन सके।
क्या महज ‘चुनावी जुमला’ है महिला आरक्षण?
स्थानीय स्तर पर अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या 33 प्रतिशत आरक्षण का वादा केवल महिलाओं के वोट बटोरने का एक ‘जुमला’ है? यदि भाजपा महिलाओं को लेकर गंभीर है, तो संगठन की बैठकों और प्रशिक्षण शिविरों जैसे महत्वपूर्ण मंचों पर उनकी उपस्थिति सुनिश्चित क्यों नहीं की जाती? मंडल अध्यक्ष नैनमल लखारा ने सात सत्रों में विचारधारा और चुनावी रणनीति की बात तो की, लेकिन महिला पदाधिकारियों की इस ‘अनुपस्थिति’ पर संगठन के पास कोई ठोस जवाब नहीं था।
प्रमुख बिंदु: जो संगठन की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हैं
* नाम मात्र के पद: आरोप लग रहे हैं कि संगठन में महिलाओं को पद तो दिए गए हैं, लेकिन वे केवल कागजों तक सीमित हैं।
* अनुपस्थिति बनी चर्चा का विषय: दो दिनों तक चले इस महाभियान में पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की भीड़ तो रही, पर महिला दीर्घा पूरी तरह खाली रही।
* प्रशिक्षण में कैसा भेदभाव? पार्टी की नीतियों और विकास यात्रा के पाठ पढ़ाए गए, लेकिन महिलाओं को इस मुख्यधारा से दूर रखना संगठन की मंशा पर सवाल उठाता है।




