सायला।
यहां एक कहावत हैं कि सर मुडाते ही ओले गिरे। ऐसा ही कुछ निकटवर्ती मेंगलवा गांव के रहने वाले मोहित राजपुरोहित के साथ हुआ। वर्ष १९९० में मोहित कुमार ने मेंगलवा गांव में गेनाराम राजपुरोहित के घर जन्म लिया। पिता के सान्निध्य में दसवीं तक की शिक्षा ग्रहण करने के बाद मोहित व्यापार एवं कारोबार सीखने के लिए मद्रास चला गया । जहां तीन वर्ष तक रहकर के वर्ष २००९ मे वापस गांव आ गया। उस समय मोहित की आयु महज २० साल के करीब थी। यहां आने पर कुछ समय तक पिता के साथ काम किया लेकिन परमात्मा को यह मंजूर नही था।
वर्ष २००९ मे ही मोहित के पिता परमात्मा को प्यारे हो गए। मोहित के बड़े भाई सुमेरसिंह राजपुरोहित कुछ समय तक साथ मे रहकर के सामाजिक रीति रीवाज की जानकारी दी किन्तु भाई का व्यवसाय मुम्बई मे होने के कारण सारी जिम्मेदारियां मोहित पर छोड कर वो मुम्बई चल गए। धीरे-धीरे मोहित ने सारी जिम्मेवारीयां अपने कंधे पर लेते हुए आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र मे मजबूत पकड बना ली। गांव मे पिताजी की दुकान पर अनाज व कृषि जिंसो का व्यवसाय संभाला।
जिससे गांव मे लोगो के बीच अपनी छवी बना ली। जिसके परिणामस्वरूप छोटी उम्र मे ही उन्होने ग्राम पंचायत मे वार्ड पंच का पद हासिल कर उप सरपंच की कुर्सी संभाल ली। उन्होने समाजिक सरोकार के कार्य करते हुए विप्र फाउण्डेशन मे ब्लॉक अध्यक्ष पद का भी जिम्मा संभालने मे कसर नही छोडी । वह राजनैतिक क्षेत्र मे बीजेपी का युवा मोर्चा जिला कोषाध्यक्ष का दायित्व संभाल रहे है। समाज मे वाराही माता मंदिर मे सह कोषाध्यक्ष, राजपुरोहित खेतेश्वर मंदिर ट्रस्ट मे महामंत्री का जिम्मा भी मिला था।
हौेंसला बढाते हुए छोटी उम्र मे ही उन्होने जिला स्तरीय व्यापार के कारोबार को संभाला। वर्तमान मे वह भीनमाल मे आर्शिवाद पाईप के वितरक का जिला स्तरीय कार्य देख रहे है। मोहित राजपुरोहित मृदुभाषी, सरल स्वभाव के व्यक्ति है। उन्होने कोरोनाकाल मे कोविड सेन्टर खोलने, गौ-शाला मे टीनशेड लगवाने, गौवंश को हरा चारा देने के साथ जरूरतमंदो को खाद्य सामग्री किट वितरण करने मे भी अपना योगदान दिया।





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