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कब मामूल पर आएगी जिले की पशु चिकित्सा व्यवस्था?

देवीसिंह राठौड़, तिलोड़ा

जालोर जिले की अधिसंख्य आबादी कृषि कार्यों पर निर्भर है। किसानों का मुख्य सहायक धंधा पशुपालन है । जिले में पशु चिकित्सा व्यवस्था मामूल पर नहीं है। पन्द्रह-बीस किलोमीटर की परिधि में पशु चिकित्सा के लिए पशु स्वास्थ्य केंद्र नहीं हैं। जहां है भी, तो या तो नफऱी की कमी का दंश झेलते हुए या फिर वांछित सुविधाओं का नितांत अभाव बना हुआ है। जिले की भौगोलिक स्थिति भी विषम परिस्थितियों वाली है। कहीं पर्वतीय धरातल, तो कहीं रेतीला। पशुओं की रुग्नावस्था के समय पशु पालकों को बेहद परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है। समय पर समुचित उपचार के अभाव में कई मवेशीकाल के गाल में समा जाते हैं। जिससे पशुपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

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राजस्थान की विभिन्न सरकारों में जालोर जिले के विधायक भेड़, ऊन, डेयरी एवं पशुपालन मंत्री रहे हैं । एकबारग़ी तो ऐसा प्रतीत होता था कि सरकार किसी भी राजनीतिक दल की बने, लेकिन भेड़, ऊन, डेयरी एवं पशुपालन मंत्री जालोर जिले का विधायक बनना तय है। मसलन स्वर्गीय पूनमचंद विश्नोई, स्वर्गीय सूरजपाल सिंह राठौड़ ‘कोकसा ‘, स्वर्गीय रघुनाथ विश्नोई, भगराज चौधरी, जोगेश्वर गर्ग, अर्जुन सिंह देवड़ा आदि । इसके बावजूद जब इन विधायकों के पैतृक जिले, विधानसभा क्षेत्र में ही पशु चिकित्सा व्यवस्था मामूल पर नहीं आ पाई, तो शेष राज्य की स्थिति का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है । ढोर विभाग के यह मंत्री ढोरों की चिकित्सा व्यवस्था मामूल पर क्यों नहीं ला पाए? वे ही जानें । या तो सरकार में इनकी चली नहीं या फिर राज्य सरकार पशु चिकित्सा व्यवस्था के प्रति उदासीन रही ।

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पशुधन को बचाना किसी चुनौती से कम नहीं
पशु बाहुल्य क्षेत्र में पन्द्रह-बीस किलोमीटर की परिधि में पशु चिकित्सा के लिए पशु स्वास्थ्य केंद्र नहीं होना सालता है। पशुओं की बीमारी के समय पशुपालकों के सामने अपने पशुधन को बचाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। समुचित एवं नज़दीकी पशु चिकित्सा व्यवस्था के अभाव में लाचार पशुपालक या तो पारंपरिक देशी नुस्खों का सहारा लेने के लिए मजबूर होते हैं या फिर तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक का। जहां पशु चिकित्सा स्वास्थ्य केंद्र हैं भी, वहां नफऱी का नितांत अभाव बना हुआ है। सूबे के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने पहले कार्यकाल में राजस्थान में 456 प्रशिक्षण प्राप्त बेरोजग़़ार पशुधन सहायकों को संविदा के आधार पर नियुक्तियां दी थीं । बारंबार के आन्दोलन, जयपुर स्थित स्टेचू सर्कल, सचिवालय के सामने धरना-प्रदर्शन के बावजूद उन्हें नियमित नहीं किया गया।

पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने अपने पहले कार्यकाल में जब इन्हें नियमित किया, तब तक आधे से अधिक संविदा पशुधन सहायक अपना कार्य छोड़ चुके थे। पशु चिकित्सा स्वास्थ्य केंद्र में जहां पशु चिकित्साकर्मी हैं वहां भी पशुपालकों की समस्या जस की तस बनी हुई है। पशुपालन विभाग का स्पष्ट आदेश है कि पशु चिकित्साकर्मी किसी भी हालत में पशु चिकित्सा केंद्र नहीं छोड़ सकते। यह अव्यवहारिक, तुग़लक़ी फऱमान है। राज्य सरकार अथवा पशुपालन विभाग को संभवत: मनुष्य एवं मवेशी के बुनियादी अंतर का भान ही नहीं है? हारी-बीमारी के समय रुग्न आदमी को पैदल अथवा वाहन में बिठाकर चिकित्सा केंद्र लाया जा सकता है, मवेशी को नहीं ।

एक दर्द यह भी…
राजस्थान में सत्ता परिवर्तन से पहले पशुओं का बीमा किया जाता था। भेड़-बकरियां दो रुपए के प्रीमियर एवं गाय-भैंस साढ़े छह सौ रुपए के प्रीमियर पर बीमित किए जाते थे । पशुओं की असामान्य मृत्यु (सर्प दंश, वज्रपात, विद्युत प्रवाह की चपेट में आने आदि) पर पशुपालकों को आर्थिक सहायता राशि प्रदान की जाती थी । जिससे पशुपालकों को आर्थिक संबल प्राप्त होता था । वर्तमान सरकार ने इसे बंद कर दिया।

shrawan singh
Contact No: 9950980481

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